जगत विज़न


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गुजरात विधानसभा चुनाव

    भाजपा का गढ़ माना जाता है और अगर अपने ही गढ़ में मोदी को गंभीर नुकसान उठाना पड़ा तो इसका असर उनके दोबारा सत्ता में लौटने की उम्मीद पर एक भारी झटका साबित होकर रहेगा। यह मानने से भी इनकार नहीं किया जा सकता कि जहां जीपीपी जीतने लायक वोट नहीं ले पाती, वहां भी वह भाजपा को भारी नुकसान पहुंचाएगी, क्योंकि भाजपा और जीपीपी को मिलने वाले पारंपरिक वोटों का विभाजन कांग्रेस के लिए बेहद फायदेमंद सिद्ध होगा। यहां यह बताना जरूरी है कि पटेलों में चार जातियां हैं- कडुआ, लेहवा, चौधरी और कोड़ी, और केशुभाई पटेल लेहवा में आते हैं तथा इन पर उनका काफी प्रभाव है, वही अन्य तीन में भी उनका गहरा असर है। सौराष्ट्र में लेहवा और कडुआ बहुतायत में हैं तथा चुनाव परिणामों पर इनका निर्णायक प्रभाव सुनिश्चित हैं, इसलिए मोदी की पेशानी पर बल क्यों पड़ रहे हैं यह समझना ज्यादा कठिन नहीं है। सारे गुजरात में ताकतवर है

पटेल बात सिर्फ सौराष्ट्र की होती तो नरेन्द्र मोदी सब्र कर सकते थे, लेकिन सौराष्ट्र के बाहर भी पटेल खासी तादाद में है, और अगर केशुभाई पटेल के नेतृत्व में भरोसा जताते हुए पटेल समुदाय उनके पक्ष में लामंबद होता है तो गुजरात की आधी से भी ज्यादा सीटों पर केशुभाई का -पटेल वोट बैंक- मोदी के समक्ष गंभीर चुनौती उपस्थित कर सकता है। यह भूला नही जा सकता कि पटेल समुदाय जनसंख्या दृष्टि से गुजरात की कुल आबादी का १९ प्रतिशत हैं और कांटे की टक्कर होने की स्थिति में इनकी एकजुटता का असर चुनाव परिणामों पर निर्णायक रूप से पड़ेगा। दूसरे शब्दों में, यह समुदाय तय कर सकता है कि मोदी को सत्ता में बने रहना है, या बेदखल हो जाना है जहां तक केशुभाई पटेल का सवाल है, वे पूरी तरह आश्वस्त हैं कि उनके वर्चस्व वाला यह समुदाय जीपीपी को समर्थन देगा, आर अगर सचमुच ऐसा होता है तो मोदी की मुश्किलें बढ़ना सुनिश्चित है।

जी.पी.पी. के मेहता, झड़पिया भी बने चुनौती गुजरात परिवर्तन पार्टी बनाकर बगावत का बिगुल बजाने वाले केशुभाई पटेल ही नरेन्द्र मोदी की नाक में दम नहीं कर रहे हैं, बल्कि गुजरात के पूर्व मुख्यमंत्री सुरेश मेहता और पूर्व मंत्री गोवर्धन झड़पिया भी उन्हें निशाने पर लिए हुए हैं। इन दोनों ही नेताओं की सारे गुजरात में बेहतर छवि और प्रभाव है, और जीपीपी में रहते हुए तथा केशुभाई पटेल के साथ कंधे से कंधा मिलाकर संघर्ष कर रहे इन राजनीतिक कद्दावरों को गुजरात में बढ़-चढ़कर समर्थन मिल रहा है, जो मोदी की दुश्वारियां बढ़ाने के लिए काफी है। कहां तो वे समझ रहे थे कि गुजरात परिवर्तन पार्टी अपने वजूद के लिए लड़ने में ही सिमटकर रह जाएगी, और कहां यह सच कि, जीपीपी सिर्फ उनकी जीत की राह का रोड़ा ही नहीं बन गई है, बल्कि सत्ता की दावेदारी जीतने लायक ताकत भी जुटाती जा रही है। निःसंदेह, इस स्थिति के पाने में सुरेश मेहता और गोवर्द्धन झड़पिया अहम भूमिका निभा रहे हैं और केशुभाई पटेल के साथ एकजुट प्रयास करते हुए गुजरात के मतदाताओं तक यह संदेश पहुंचाने में सफल सिद्ध हो रहे हैं कि अगर मोदी से निजात पानी है तो परिवर्तन, यानि गुजरात परिवर्तन पार्टी ही विकल्प है।

एंटी मोदी ताकतें भी एकजुट गुजरात की राजनीति के तीन शीर्ष व्यक्तिवोें-केशुभाई, मेहता और झड़पिया के साथ आने से परेशान मोदी की बदकिस्मती कहें या बदलते वक्त को नहीं भांपने की गलती कि जैस-जैसे चुनाव नजदीक आ रहे है, जीपीपी तो ताकतवर होती ही जा रही है, उसके समर्थन में वे नेता-कार्यकर्ता भी सक्रिय होते जा रहे हैं, जिनकी राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ और भारतीय जनता पार्टी में आस्था है, किन्तु नरेन्द्र मोदी उन्हें फूटी आंखों भी नहीं सुहाते हैं। उनकी इस नापसंदगी की वजह मोदी की वह निरंकुशता है, जिसके चलते गुजरात में उन्हीं नेताओं -कार्यकर्ताओं को तरजीह मिल रही थी, जो पार्टी के प्रति मोदी के प्रति अधिक समर्पित थे और मोदी अच्छा करें या बुरा, हां में हां, मिलाते रहते थे। यही वह मोदी ब्रिगेड है, जो राजनीतिक तौर पर भले ही भाजपा के नाम से चुनाव मैदान में हैं, असलियत में न पार्टी की विचारधारा के अनुरूप आचरण कर रही और न ही इस राष्ट्रीय पार्टी के प्रति प्रतिबद्ध है। मोदी की इसी निरंकुशता के कारण वे तमाम पार्टी नेता और कार्यकर्ता, जो व्यक्तिवाद को तरजीह न देते हुए राष्ट्रीय नेतृत्व के अनुगामी बने रहना चाहते थे, शनैः-शनैः मोदी से छिटकते गए और अब जबकि चुनाव में चंद दिन ही शेष रह गए हैं, अपनी ही पार्टी के खिलाफ जाने को मजबूर हो रहे है। आश्चर्यजनक यह है कि इनमें वे नेता-कार्यकर्ता भी शामिल हैं जो जाहिर तौर पर भाजपा में हीं है किन्तु चुनाव प्रचार में निष्क्रिय भूमिका निभाते हुए जीपीपी की दावेदारी को पुख्ता करने के जतन कर रहे हैं। एंटी मोदी ताकतों को इस बात से सरोकार नहीं है कि उनकी यह निष्क्रियता पार्टी के लिए अहितकारी है, क्योंकि वे मोदी के मुकाबले केशुभाई पटेल और उनके साथियों को बेहतर विकल्प मानते हैं और मोदी के निरंकुश बर्ताव से दुखी होकर इस नतीजे पर पहुंचते हैं कि गुजरात में अगर मोदी का शासन बरकरार रहता है तो मोदी और भी अधिक दंग हो जाएंगे, जो भाजपा के लिए ठीक नहीं होगा। इन नेताओं-कार्यकर्ताओं को महसूस होने लगा है कि नरेन्द्र मोदी की कार्यशैली भाजपा के लोकतांत्रिक मूल्यों के सर्वथा विपरीत है और मनमानी तथा एकाधिकारवाद से प्रेरित हैं, इसीलिए वे खुलकर या गुप्त प्रयास जारी रखते हुए मोदी के खिलाफ काम कर रहे हैं। पार्टी के प्रति निष्ठावान नेताओं का भीतर ही भीतर पनपता यह असंतोष चुनाव नतीजों पर असर डाले बगैर नहीं रहेगा। संजय की संघ लाबी भी खिलाफ आगे...